नई दिल्ली,संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से बदलाव करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि यह न्यायपालिका नहीं, बल्कि विधायिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वे इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाकर गलत नंबर मिला रहे हैं। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी टिप्पणी की कि इन दिनों विरोध प्रदर्शन, धरने और नारेबाजी का मौसम है, इसलिए इस मांग को संसद के सामने उठाया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(ग) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया था। इस प्रावधान के तहत उन निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की जाती है, जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक है। हालांकि, इसमें आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को निश्चित अंतराल पर बदलने की अनिवार्यता नहीं है।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अदालत संविधान की अनुसूची को दोबारा नहीं लिख सकती। न्यायालय किसी प्रावधान को निरस्त कर सकता है या उसके अर्थ की सीमा निर्धारित कर सकता है, लेकिन आरक्षण के संबंध में निर्वाचन क्षेत्रों के अनिवार्य बदलाव का नया प्रावधान जोड़कर कानून को दोबारा नहीं लिख सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विषय पर विचार करना और आवश्यक बदलाव करना विधायिका का काम है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि परिसीमन कोई निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक निश्चित समय पर की जाने वाली कानूनी कवायद है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि परिसीमन 2010 में किया गया है, तो अगली बार परिसीमन के दौरान निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन किए जाने की अपेक्षा की जाती है। हालांकि, परिसीमन अपने आप में एक कानूनी प्रक्रिया है।
पीठ ने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की अधिक आबादी वाले क्षेत्रों को आरक्षित करने से जातिगत विभाजन गहरा होता है या नहीं, यह विधायिका के विचार-विमर्श का विषय है। केवल इस आधार पर संबंधित कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता।याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का वितरण राज्य के अलग-अलग हिस्सों में होना चाहिए। जिन जिलों और क्षेत्रों में अनुसूचित जाति की आबादी का अनुपात अधिक है, वहां जनसंख्या के आधार पर आरक्षित सीटें निर्धारित की जानी चाहिए। उनका कहना था कि आरक्षित सीटों का अलग-अलग क्षेत्रों में बदलाव होने से प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ेगा और अलग-अलग इलाकों के लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित कानूनी प्रावधान में निर्वाचन क्षेत्रों के बदलाव की कोई व्यवस्था नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि जब इसके लिए कोई कानूनी ढांचा ही मौजूद नहीं है, तो क्या अदालत परिसीमन आयोग या सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में बदलाव करने का निर्देश दे सकती है?याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उनकी बात को कहीं सुना नहीं जा रहा है और उनका प्रतिवेदन संसद तक भी नहीं पहुंचाया गया, ताकि इस पर कम से कम विचार किया जा सके। उन्होंने यह भी दलील दी कि लंबे समय से कुछ ही परिवार बारी-बारी से आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ते आ रहे हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने मतदान के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लडऩे के दावे के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लडऩे की स्वतंत्रता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह कोई संवैधानिक प्रश्न नहीं है, बल्कि विधायिका और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के लिए यह तय करने का विषय है कि विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव की व्यवस्था होनी चाहिए या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा व्यवस्था से मतदान के अधिकार का हनन नहीं होता।मुख्य न्यायाधीश ने राजनीतिक लोकतंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अलग-अलग विचारधाराओं वाली अनेक राजनीतिक पार्टियां हैं। मतदाता कई बार उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं। ऐसे में केवल निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित होने से मतदाताओं के राजनीतिक विकल्प समाप्त नहीं हो जाते।
पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि क्या अनुसूचित जाति की अधिक आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अनिवार्य रूप से जाति के आधार पर ही मतदान करते हैं? अदालत ने कहा कि इन पहलुओं पर व्यापक नीतिगत विचार-विमर्श की जरूरत है।यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कादीपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह ने दायर की थी। कादीपुर विधानसभा सीट पिछले लगभग सात दशकों से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रही है। याचिकाकर्ता ने इसी व्यवस्था में बदलाव की मांग करते हुए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के अनिवार्य चक्रीय परिवर्तन की आवश्यकता जताई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर न्यायिक हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि आरक्षित सीटों के बदलाव से जुड़ी व्यवस्था बनाने का अधिकार संसद और विधायिका के पास है। अदालत की टिप्पणी से साफ है कि इस विषय पर किसी भी तरह का नीतिगत बदलाव न्यायिक आदेश के बजाय विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है।


