
Educationist & Motivator
क्यों दिए दो घर, जब दोनों पराये थे। कुछ पल यहाँ, आधा जीवन देकर वहां, मैंने भी तो सजाये थे।
ना नाम की तख्ती, ना ओहदे की शक्ति मिल पायी थी, दोनों आँगन में रंगोली मैंने ही तो सजाई थी।
‘पराये घर जाना है’, ‘पराये घर से आई है’ यह तो बहाने थे न अपनाने के।
खुश हूँ फिर भी पिंजरे की चिड़िया बनकर भूलकर हर घाव ज़माने के।
ख्वाब सजाऊंगी सबके ज़िम्मेदारियाँ निभाऊंगी हर आँगन को घर मैं ही बनाउंगी।


