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April 17, 2026
सी टाइम्स
अंतरराष्ट्रीय

पाकिस्तान में बढ़ते बाल उत्पीड़न के मामले, कमजोर वर्गों की सुरक्षा में सिस्टम की नाकामी: रिपोर्ट



इस्लामाबाद, 16 अप्रैल । पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न के मामले न केवल हिंसा में चिंताजनक बढ़ोतरी को दर्शाते हैं, बल्कि कमजोर वर्गों की सुरक्षा करने वाले तंत्र की विफलता को भी उजागर करते हैं। एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और हत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन ये घटनाएं कुछ समय के लिए सुर्खियों में रहने के बाद जल्द ही भुला दी जाती हैं।



बाल अधिकार संगठन साहिल के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में बाल उत्पीड़न के 3,630 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8 प्रतिशत अधिक हैं।



हालांकि ये आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं, लेकिन इन मामलों पर न तो व्यापक राष्ट्रीय बहस हो पाती है और न ही ठोस नीतिगत समीक्षा देखने को मिलती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर गंभीर घटना के बाद कुछ समय के लिए आक्रोश जरूर दिखता है, लेकिन जल्द ही मामला ठंडा पड़ जाता है।



यूरोपियन टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, “बाल उत्पीड़न के मामलों में बढ़ोतरी एक गहरे संकट की ओर इशारा करती है, जो अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों में फैला हुआ है। इसमें शारीरिक हिंसा, यौन शोषण और उपेक्षा जैसे कई अपराध शामिल हैं। हर मामला न सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि सुरक्षा तंत्र की विफलता भी है।”



रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों को लेकर कुछ समय के लिए व्यापक चर्चा होती है, लेकिन यह चर्चा स्थायी बदलाव या जवाबदेही में नहीं बदल पाती। हर घटना के साथ यही चक्र दोहराया जाता है—पहले आक्रोश, फिर दुख और अंत में चुप्पी।



रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में आरोपी पीड़ित के परिचित होते हैं, जैसे पड़ोसी, जान-पहचान वाले या यहां तक कि परिवार के सदस्य। इससे मामलों की पहचान और कार्रवाई और जटिल हो जाती है, क्योंकि पीड़ितों के लिए शिकायत दर्ज कराना कठिन हो जाता है।



विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में बाल उत्पीड़न के मामले वास्तविक आंकड़ों से भी ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि सामाजिक बदनामी और सांस्कृतिक दबाव के कारण कई घटनाएं सामने ही नहीं आ पातीं।



रिपोर्ट में कहा गया है कि “परिवार अक्सर सामाजिक बदनामी के डर से ऐसे मामलों की रिपोर्ट नहीं करते, और कई बार पीड़ितों को भी डर या दबाव के चलते चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। यह चुप्पी समस्या को और गंभीर बना देती है और इसके समाधान में बाधा बनती है।”



रिपोर्ट ने इस समस्या से निपटने के लिए समाज और संस्थागत स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है।

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