ग्रामीण अंचल की प्रतिभा ने मेहनत और लगन से हासिल की सफलता, शिक्षा को बताया आत्मनिर्भरता की कुंजी
दृढ़ संकल्प, निरंतर परिश्रम और शिक्षा के प्रति समर्पण से हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। इस बात को लांजी क्षेत्र के ग्राम बकरामुंडी की प्रतिभाशाली बेटी सुशीला वरकड़े ने सच साबित कर दिखाया है। मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) द्वारा आयोजित सहायक प्राध्यापक परीक्षा-2024 में उनका चयन भूगोल विषय के सहायक प्राध्यापक पद पर हुआ है। उनकी इस उपलब्धि से परिवार, मित्रों, गुरुजनों और पूरे जिले में खुशी का माहौल है।
सुशीला की सफलता केवल एक प्रतियोगी परीक्षा में चयन की कहानी नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण क्षेत्र की बेटियों के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास और शिक्षा की शक्ति का प्रेरणादायक उदाहरण भी है। सीमित संसाधनों के बीच आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने सपनों को साकार किया और यह साबित कर दिया कि मेहनत के सामने परिस्थितियां छोटी पड़ जाती हैं।
स्वर्ण पदक से मिली नई प्रेरणा
सुशीला वरकड़े ने वर्ष 2020-21 में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। उन्होंने एमपीपीएससी की प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा में भी भाग लिया और लगातार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती रहीं। इसी दौरान वर्ष 2023 में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर द्वारा स्नातकोत्तर स्तर पर सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के लिए उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।
यह उपलब्धि उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। स्वर्ण पदक मिलने के बाद भूगोल विषय के प्रति उनकी रुचि और अधिक बढ़ी तथा उन्होंने इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने का निर्णय लिया। वर्ष 2024 में उन्होंने यूजीसी-नेट और एमपी-सेट परीक्षाएं सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कीं। इसके बाद उन्होंने एमपीपीएससी सहायक प्राध्यापक परीक्षा में सफलता प्राप्त कर भूगोल विषय में सहायक प्राध्यापक पद हासिल किया।
सफलता के पीछे परिवार और गुरुजनों का योगदान
सुशीला अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, महाविद्यालयीन गुरुजनों, भूगोल विषय के शिक्षक आर.आर. टिकेश्वर, मित्रों तथा पाथ फाइंडर इंस्टीट्यूशन, बालाघाट के संस्थापक मनीष को देती हैं। उनका कहना है कि कठिन समय में इन सभी का मार्गदर्शन, सहयोग और विश्वास उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
वे बताती हैं कि उनके माता-पिता भले ही उच्च शिक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझते हुए हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके माता-पिता का सपना था कि उनकी बेटियां आत्मनिर्भर बनें, अपने पैरों पर खड़ी हों और समाज में अपनी अलग पहचान स्थापित करें।
बेटियों के लिए दिया प्रेरणादायी संदेश
अपनी सफलता के बाद सुशीला ने विशेष रूप से ग्रामीण अंचल की बेटियों को शिक्षा का महत्व समझाते हुए कहा कि “शिक्षा जीवन में बदलाव की सबसे बड़ी शक्ति है। बेटियों को बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए पूरी लगन और मेहनत से प्रयास करना चाहिए। असफलताओं से घबराने के बजाय उनसे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि संसाधनों की कमी कभी भी सफलता के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती, यदि व्यक्ति के भीतर आगे बढ़ने का जज्बा हो। साथ ही उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की शक्ति समझें तथा उन्हें शिक्षा और आत्मनिर्भरता के अवसर प्रदान करें।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान का संकल्प
सहायक प्राध्यापक पद पर चयनित होने के बाद सुशीला वरकड़े का लक्ष्य केवल अध्यापन तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि वे शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करते हुए अधिक से अधिक विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करना चाहती हैं, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं भी अपने सपनों को साकार कर सकें।
सुशीला की यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए गौरव का विषय है, बल्कि बालाघाट जिले की उन हजारों बेटियों के लिए भी प्रेरणा है जो शिक्षा और मेहनत के दम पर अपने भविष्य को नई दिशा देना चाहती हैं। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो सफलता की मंजिल दूर नहीं होती।


