जबलपुर। श्रीमद्भगवद्गीता केवल युद्ध के मैदान में दिया गया उपदेश नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के जीवन में चल रहे उस संघर्ष का समाधान है, जो बाहर से अधिक भीतर चलता है। हमारे पास सब कुछ होने के बावजूद मन अशांत क्यों रहता है, इच्छाएं पूरी होने के बाद भी नई इच्छाएं क्यों जन्म लेती हैं और वास्तविक शांति की प्राप्ति कब होती है—इन प्रश्नों का समाधान गीता में मिलता है।
उक्त विचार परमहंस स्वापरमहंस स्वामी गिरिशानन्द सरस्वती जी महाराज ने साकेतधाम गौरीघाट में आयोजित श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय ‘सांख्य योग’ पर आधारित प्रवचन सत्र के पंचम दिवस व्यक्त किए। प्रवचन शाम 5:30 से 6:30 बजे तक हुआ।
महाराज जी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब मनुष्य के अंतःकरण में प्रसन्नता और शांति आती है, तब उसके सभी दुखों का क्षय होने लगता है और उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है। उन्होंने ‘प्रसाद’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ समझाते हुए कहा कि प्रसाद केवल मंदिर में मिलने वाली वस्तु नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा से प्राप्त मन की निर्मलता और संतुलित चित्त भी है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर अपनी शांति को बाहरी परिस्थितियों से जोड़ देता है। वह सोचता है कि कोई व्यक्ति बदल जाए, परिस्थितियां अनुकूल हो जाएं या अधिक धन मिल जाए तो उसे शांति मिलेगी। जबकि गीता का संदेश है कि पहले अपने चित्त को प्रसन्न और संतुलित करना आवश्यक है। परिस्थितियां हमेशा मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उन्हें देखने का दृष्टिकोण मनुष्य के हाथ में होता है।
भगवान श्री रामेश्वरम महादेव का हुआ विशेष श्रृंगार
श्रावण मास की एकादशी के अवसर पर भगवान श्री रामेश्वरम महादेव का स्वामी जगन्नाथ के स्वरूप में विशेष श्रृंगार किया गया। इस अवसर पर भगवान को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए।
प्रवचन से पूर्व महाराज श्री का पूजन ब्रजेन्द्र उपाध्याय, रेखा चुडासमा, वंदना मनोज लोहिया, राजेश पटेल, मनीष गुप्ता, रामकुमार पटेल, प्रमिला अग्रवाल, प्रणव पाठक, यश व्यास, अमन दुबे, दिलीप चतुर्वेदी, एसके चौरसिया, उमेश पिल्ले, अटल बिहारी, पंकज अग्रवाल, अलभ्य बाजपेयी, भानु नवेरिया, बालकृष्ण अग्रवाल, नलिन पांडेय, रमेश नवेरिया, उमेश नवेरिया, राजेश सोनी और मनीष दुबे सहित श्रद्धालुओं ने किया। पूजन विधि पंडित रोहित दुबे एवं पंडित सौरभ दुबे ने संपन्न कराई।


