मध्यप्रदेश को गर्व है कि उसे देश का “टाईगर स्टेट” कहा जाता है। यहां सर्वाधिक बाघ हैं, सबसे अधिक टाइगर रिज़र्व हैं और वन्यजीव संरक्षण के बड़े-बड़े दावे भी किए जाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इसी टाईगर स्टेट में आज टाइगर स्वयं असुरक्षित होता जा रहा है। हाल के वर्षों में बाघों की संदिग्ध मौतें, आपसी संघर्ष, शिकार, ज़हरखुरानी और मानव–वन्यजीव टकराव की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं, जो सरकारी दावों की पोल खोलती हैं।
बाघों की सुरक्षा केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित कर दी गई है। कैमरा ट्रैप, गणना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वाहवाही तो खूब होती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग है। कई टाइगर रिज़र्व में स्टाफ की भारी कमी है, फील्ड में तैनात वनरक्षक संसाधनों के अभाव में काम कर रहे हैं और गश्त व्यवस्था काग़ज़ों तक सिमट गई है। परिणामस्वरूप शिकारियों के हौसले बुलंद हैं और बाघ लगातार खतरे में हैं।
दूसरी बड़ी समस्या है मानव–वन्यजीव संघर्ष। जंगलों का सिमटना, खनन, सड़क-रेल परियोजनाएं और अवैध अतिक्रमण बाघों के प्राकृतिक आवास को खत्म कर रहे हैं। भोजन और क्षेत्र की तलाश में बाघ गांवों की ओर बढ़ते हैं, जिससे टकराव होता है। कई मामलों में ग्रामीणों की मौत होती है तो कई बार गुस्से और डर में बाघों को मार दिया जाता है या ज़हर दे दिया जाता है। मुआवज़ा और पुनर्वास की सुस्त प्रक्रिया इस टकराव को और गंभीर बना देती है।
चिंता की बात यह भी है कि कुछ टाइगर रिज़र्व पर्यटन केंद्र बनते जा रहे हैं। वीआईपी सफारी, रिसॉर्ट संस्कृति और व्यवसायिक दबाव ने संरक्षण की आत्मा को नुकसान पहुंचाया है। सवाल यह है कि क्या हम बाघ को बचाना चाहते हैं या केवल उसे दिखाकर कमाई करना?
टाईगर स्टेट का तमगा तभी सार्थक होगा जब बाघ सुरक्षित होंगे। इसके लिए ज़रूरी है कि संरक्षण को केवल प्रचार नहीं, बल्कि प्राथमिकता बनाया जाए। फील्ड स्टाफ की भर्ती और प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, शिकार पर सख्त कार्रवाई, वन क्षेत्रों का विस्तार, कॉरिडोर की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की सहभागिता बेहद जरूरी है। साथ ही विकास परियोजनाओं में वन्यजीवों के हितों की अनदेखी बंद करनी होगी।
बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण संतुलन का प्रहरी है। यदि टाईगर स्टेट में टाइगर ही असुरक्षित रहा, तो यह न केवल शासन-प्रशासन की विफलता होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय भी। अब समय है कि नारे नहीं, ठोस और ईमानदार संरक्षण की राजनीति की जाए


