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October 27, 2026
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दृष्टिकोण: सवर्ण बनाम आरक्षित: क्या UGC के नियमों ने बढ़ा दी है दूरी?, “झूठी शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं?”

यूजीसी 2026 के नए नियम: संरक्षण का कवच या विवादों की नई बिसात?

शिक्षा के मंदिरों (विश्वविद्यालयों) में जब नियम और राजनीति का संगम होता है, तो बहस का गर्म होना लाजिमी है। हाल ही में यूजीसी द्वारा घोषित 2026 के नए नियमों ने शैक्षणिक जगत में एक नई हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ जहां ये नियम भेदभाव मुक्त परिसर बनाने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर इन्हें विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर प्रहार और ‘मंडल-कमंडल’ की राजनीति का नया संस्करण माना जा रहा है।

इरादा बनाम हकीकत यूजीसी के नियमों की जड़ें 2012 के उन दुखद सुप्रीम कोर्ट मामलों में हैं, जहां दो छात्रों की मौत ने व्यवस्था को झकझोर दिया था। उद्देश्य स्पष्ट था—धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या दिव्यांगता के आधार पर किसी भी छात्र के साथ अपमानजनक व्यवहार न हो। प्रोफेसर शारदुल सिंह संधू के अनुसार, ड्राफ्ट (मसौदा) तक तो सब ठीक था, लेकिन अंतिम घोषणा में हुए कुछ बदलावों ने ‘न्याय’ की परिभाषा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

विवाद का मुख्य केंद्र: ‘झूठी शिकायत’ का मुद्दा इस पूरे विवाद की सबसे कमजोर कड़ी वह प्रावधान है जिसे अंतिम समय में हटा दिया गया। ड्राफ्ट में प्रावधान था कि यदि कोई शिकायत (SC/ST/OBC या अन्य श्रेणियों के तहत) गलत या दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता पर भी दंडात्मक कार्रवाई होगी। इस क्लॉज का हटना ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांतों के खिलाफ प्रतीत होता है। जब एक पक्ष को बिना जांच के दोषी मान लिया जाए या दूसरे पक्ष को गलत शिकायत करने की छूट मिल जाए, तो वहां कानून का दुरुपयोग (Misuse) होने की आशंका बढ़ जाती है, जैसा कि हमने पूर्व में दहेज विरोधी कानूनों के मामलों में देखा है।

राजनीतिक चश्मा और चुनावी समीकरण 2026 के चुनावी साल में इन नियमों का आना कई सवाल पैदा करता है। क्या यह वास्तव में सामाजिक सुधार है या केवल एक सियासी समीकरण बैठाने की कोशिश? समाज एक ‘प्रैक्टिकल लैबोरेट्री’ है, जहां राजनीतिक दल अपने प्रयोग करते हैं। लेकिन शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह के प्रयोग छात्रों के बीच सवर्ण बनाम आरक्षित की खाई को और गहरा कर सकते हैं।

संविधान ही सर्वोच्च गुरु यदि कोई नियम संविधान के ‘समानता के अधिकार’ का उल्लंघन करता है, तो उसका बौद्धिक और कानूनी विरोध अनिवार्य है। यूजीसी को चाहिए कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार करे और यह सुनिश्चित करे कि न्याय केवल एक पक्ष के लिए न हो, बल्कि सबके लिए समान हो। अदालती दखल और बौद्धिक विमर्श ही इस ‘प्रशासनिक अराजकता’ का सही समाधान निकाल सकते हैं।

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