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April 22, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

रिटायरमेंट के बाद खुली ‘कमाई’ की परतें: एसडीओ की संपत्ति ने खड़े किए बड़े सवाल

जबलपुर। लोक निर्माण विभाग के रिटायर्ड एसडीओ महेंद्र नागवंशी अब उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां उनकी पूरी नौकरी के दौरान की कमाई पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की कार्रवाई में सामने आई करोड़ों की संपत्ति ने यह संकेत दिया है कि मामला केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित पैटर्न का हिस्सा भी हो सकता है।
गुरुवार को छिंदवाड़ा के आदर्श नगर स्थित निवास पर हुई सर्चिंग कार्रवाई में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने जांच एजेंसी को भी चौंका दिया। प्रारंभिक जांच में करीब 5.47 करोड़ रुपए की अनुपातहीन संपत्ति का खुलासा हुआ है।
संपत्ति का पूरा ब्यौरा एक नजर में
तलाशी के दौरान ईओडब्ल्यू को विभिन्न रूपों में बड़ी मात्रा में संपत्ति मिली—
मकान – लगभग 40 लाख रुपए मूल्य
दुकान – करीब 13 लाख रुपए
नकद राशि – 91,500 रुपए
घरेलू सामान – लगभग 24 लाख रुपए
बीमा पॉलिसियां – 22 पॉलिसियों में करीब 20 लाख रुपए का निवेश
सोना – 187 ग्राम
चांदी – लगभग 1 किलोग्राम
चारपहिया वाहन – 3 (करीब 20 लाख रुपए)
दोपहिया वाहन – 3 (करीब 2.10 लाख रुपए)
बैंक खाते – महेंद्र नागवंशी के 8 और पत्नी सीमा नागवंशी के 10 खाते
संपत्ति का फैलाव, शक की जड़
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि संपत्ति सिर्फ एक ही माध्यम में नहीं, बल्कि अलग-अलग रूपों में फैलाई गई है—जमीन, नकदी, निवेश, गहने और वाहन। यह पैटर्न इस ओर इशारा करता है कि संपत्ति को व्यवस्थित तरीके से छिपाने या विभाजित रखने की कोशिश की गई हो सकती है।
इतनी बड़ी संख्या में बैंक खातों का होना भी जांच का अहम बिंदु बन गया है। एजेंसी अब इन खातों के जरिए हुए लेन-देन और संभावित स्रोतों की पड़ताल में जुटी है।
रिटायरमेंट के बाद कार्रवाई, सिस्टम पर सवाल
मामले का एक बड़ा पहलू यह भी है कि यह कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद सामने आई। यानी सेवा के दौरान यह संपत्ति लगातार बढ़ती रही, लेकिन निगरानी तंत्र इसे पकड़ नहीं पाया या नजरअंदाज करता रहा।
ईओडब्ल्यू ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस करोड़ों की संपत्ति का असली स्रोत क्या है—और क्या इसमें विभागीय मिलीभगत की भी कोई कड़ी जुड़ी है।
फिलहाल, यह मामला न सिर्फ एक अधिकारी, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

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