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Jabalpur
June 11, 2026
सी टाइम्स
प्रादेशिक

गाड़ी पांच मिनट में उठती है, कचरा पांच दिन में क्यों नहीं?

जबलपुर। नगर निगम की कार्यशैली आज शहर के आम नागरिक से एक सीधा सवाल पूछ रही है क्या इस शहर में व्यवस्था सिर्फ वहां तेज चलती है, जहां से चालान और जुर्माने की कमाई होती है?

सवाल कड़वा है, लेकिन जरूरी है।

क्योंकि सड़क पर गलत तरीके से खड़ी गाड़ी नगर निगम और ट्रैफिक अमले को पांच मिनट में दिख जाती है। क्रेन आती है, वाहन उठता है, चालान कटता है, जुर्माना वसूला जाता है और व्यवस्था की “फुर्ती” कैमरे में कैद हो जाती है। लेकिन उसी शहर में कचरे के ढेर डस्टबिन के पास, कॉलोनियों के बाहर, सड़क किनारे और रहवासी इलाकों में पांच-पांच दिन तक पड़े रहते हैं। वहां न कोई क्रेन आती है, न कोई जिम्मेदार अधिकारी दौड़ता है, न कोई तात्कालिक कार्रवाई दिखती है।

तो फिर सवाल उठता है क्या नगर निगम की नजर सिर्फ कमाई वाली अव्यवस्था पर तेज है और जनता की परेशानी वाली अव्यवस्था पर कमजोर?

गलत पार्किंग गलत है, इसमें कोई दो राय नहीं। सड़क जनता की है, उसे निजी पार्किंग बनाना अनुचित है। ऐसे वाहन उठने चाहिए, चालान भी होना चाहिए। लेकिन स्वच्छता भी तो जनता का अधिकार है। टैक्स देने वाला नागरिक सिर्फ चालान भरने के लिए नहीं, बल्कि साफ सड़क, साफ नाली और साफ मोहल्ला पाने के लिए भी नगर निगम को पैसा देता है।

यह कैसी व्यवस्था है, जहां नागरिक की गलती पर कार्रवाई बिजली की तरह गिरती है, लेकिन व्यवस्था की लापरवाही पर फाइल भी नहीं हिलती?

शहर को साफ रखना पहले नागरिक की जिम्मेदारी है। लोग सड़क पर कचरा न फेंकें, सार्वजनिक जगहों पर गुटखा-पान न थूकें, नालियों में प्लास्टिक न डालें यह बुनियादी नागरिक अनुशासन है। लेकिन जब नागरिक कचरा तय स्थान पर डालता है, डस्टबिन के पास रखता है, टैक्स देता है, शुल्क देता है, तब उस कचरे को उठाना किसकी जिम्मेदारी है? क्या जनता टैक्स इसलिए देती है कि कचरा उसके घर के बाहर सड़ता रहे और बीमारी की दुर्गंध उसके बच्चों तक पहुंचे?

महात्मा गांधी ने स्वच्छता को सिर्फ सफाई नहीं, सभ्यता का आईना माना था। लेकिन जब शहर का आईना कचरे से ढक जाए और जिम्मेदार विभाग सिर्फ जुर्माने की चमक में अपनी उपलब्धि खोजे, तो यह स्वच्छता नहीं, प्रशासनिक पक्षपात कहलाता है।

नगर निगम को यह समझना होगा कि नागरिक कोई एटीएम मशीन नहीं है, जिसे गलत पार्किंग पर दबाओ और पैसा निकल आए। नागरिक शहर का मालिक है, करदाता है, मतदाता है और सबसे बढ़कर इस व्यवस्था का असली हितधारक है।

अगर गलत पार्किंग हटाने के लिए वाहन उठाने वाली टीम इतनी तेजी से सक्रिय हो सकती है, तो कचरा उठाने वाली टीम क्यों नहीं? अगर एक गाड़ी सड़क पर बाधा है, तो पांच दिन से पड़ा कचरा क्या है? क्या वह बीमारी की बाधा नहीं? क्या वह स्वच्छता की हत्या नहीं? क्या वह नगर निगम के दावों पर पड़ा सार्वजनिक आरोप नहीं?

असल समस्या यही है जहां जुर्माना है, वहां गति है। जहां सेवा है, वहां सुस्ती है।

शहर में स्वच्छता अभियान के पोस्टर लगाना आसान है, कचरा उठाना कठिन। मंचों से भाषण देना आसान है, गलियों में बदबू झेल रही जनता के बीच जाना कठिन। स्वच्छता सर्वेक्षण में नंबर लाने की तैयारी आसान है, रोजाना सफाई व्यवस्था को ईमानदारी से चलाना कठिन।

लेकिन शहर पोस्टर से साफ नहीं होते। शहर नारे से नहीं चमकते। शहर तब साफ होते हैं, जब जिम्मेदारी जमीन पर उतरती है।

जबलपुर की जनता यह नहीं कह रही कि गलत पार्किंग पर कार्रवाई बंद कर दो। जनता सिर्फ इतना पूछ रही है कि जिस ताकत से वाहन उठाते हो, उसी ईमानदारी से कचरा क्यों नहीं उठाते? जिस तेजी से चालान बनाते हो, उसी तेजी से सफाई क्यों नहीं करवाते? जिस व्यवस्था से जुर्माना वसूलते हो, उसी व्यवस्था से जनता को सेवा क्यों नहीं देते?

नगर निगम को याद रखना चाहिए चालान व्यवस्था का प्रमाण नहीं, सेवा व्यवस्था का प्रमाण है। जनता पर कार्रवाई करना आसान है, जनता के लिए काम करना असली परीक्षा है।

आज जरूरत है कि नगर निगम अपने भीतर झांके। क्या प्राथमिकता शहर है या वसूली? क्या लक्ष्य स्वच्छता है या दिखावा? क्या जनता साझेदार है या सिर्फ चालान भरने वाली भीड़?

अगर गाड़ी पांच मिनट में उठ सकती है, तो कचरा पांच दिन तक नहीं पड़ा रहना चाहिए।

क्योंकि गलत पार्किंग से सड़क रुकती है, लेकिन सड़ता हुआ कचरा शहर की आत्मा को रोक देता है।

और जब शहर की आत्मा सड़ने लगे, तो सवाल सिर्फ सफाई का नहीं रहता सवाल व्यवस्था की नीयत का हो जाता है।

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