सी टाइम्स न्यूज बालाघाट
जिले में बच्चों के कुपोषण की स्थिति एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा अगस्त 2026 में जारी आंकड़ों के अनुसार, शून्य से पांच वर्ष तक के 1 लाख 21 हजार 892 बच्चों का वजन परीक्षण कराया गया। इनमें 27 हजार से अधिक बच्चे कुपोषित पाए गए, जबकि 3,741 बच्चे अतिकुपोषित श्रेणी में दर्ज किए गए हैं।
यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है, जब जिले के आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों में मीजल्स, पीलिया, डायरिया और खून की कमी जैसी स्वास्थ्य समस्याओं की खबरें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि वर्षों से संचालित पोषण आहार और बाल स्वास्थ्य योजनाओं के बावजूद जमीनी स्थिति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं दिखाई दे रहा?
बैहर-बिरसा में कुपोषण की तस्वीर और गंभीर
आदिवासी बाहुल्य बैहर और बिरसा क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक बताई गई है। आंकड़ों के मुताबिक बैहर में 10,640 बच्चे कुपोषण से प्रभावित पाए गए। इनमें 460 बच्चे अतिकुपोषित और 1,620 बच्चे मध्यम कुपोषित श्रेणी में दर्ज किए गए।
वहीं बिरसा में 14,259 बच्चों का वजन परीक्षण किया गया। इनमें 551 बच्चे अतिकुपोषित, 1,948 मध्यम कुपोषित और 1,197 बच्चे कम वजन वाले पाए गए। ये आंकड़े आदिवासी अंचलों में पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
आंकड़े सामने आए, लेकिन पुराने आंकड़े क्यों नहीं?
कुपोषण की वास्तविक स्थिति समझने के लिए केवल एक वर्ष के आंकड़े पर्याप्त नहीं होते। वर्ष-दर-वर्ष आंकड़ों की तुलना से ही यह पता चल सकता है कि कुपोषण घटा है या बढ़ा और सरकारी योजनाओं का कितना असर हुआ।
मीडिया द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी देवेन्द्र कुमार सुन्दरियाल से वर्ष 2026 से पहले के वर्षों के आंकड़े जानने का प्रयास किया गया, लेकिन जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने की बात सामने आई।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि यदि पुराने आंकड़े सार्वजनिक नहीं होंगे, तो जिले में कुपोषण के खिलाफ किए गए प्रयासों की सफलता का आकलन कैसे होगा?
कागजी लक्ष्य या बच्चों की वास्तविक सेहत?
सरकार की योजनाओं का उद्देश्य केवल बच्चों का वजन दर्ज कर लक्ष्य पूरा करना नहीं, बल्कि उन्हें कुपोषण से बाहर लाना होना चाहिए। यदि हजारों बच्चे आज भी कुपोषित और हजारों में से सैकड़ों अतिकुपोषित श्रेणी में हैं, तो पोषण आहार, आंगनवाड़ी सेवाओं, स्वास्थ्य जांच और उपचार व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बैहर, परसवाड़ा और बिरसा जैसे क्षेत्रों में कुपोषण के साथ बीमारियों की चुनौती भी सामने है। ऐसे में प्रशासन को केवल आंकड़े जारी करने के बजाय कुपोषण के कारणों, उपचार, पोषण वितरण, आंगनवाड़ी सेवाओं और बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति का स्वतंत्र एवं पारदर्शी ऑडिट कराना चाहिए। सवाल अब यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हजारों कुपोषित बच्चों के भविष्य को आंकड़ों से आगे कब प्राथमिकता मिलेगी?


