अनूपपुर नपा की पीआईसी में सियासी उलटफेर के बाद कांग्रेस जिला नेतृत्व की चुप्पी पर उठे सवाल*
*संजय चौधरी के आरोपों के बाद भी कांग्रेस पार्षदों पर कार्रवाई क्यों नहीं?*
*‘फूल छाप कांग्रेसी’ को बर्दाश्त नहीं करने के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई का इंतजार*
अनूपपुर। जिला मुख्यालय की नगर पालिका परिषद अनूपपुर में पीआईसी को लेकर एक बार फिर हुए सियासी उलटफेर ने भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस संगठन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। वार्ड क्रमांक-2 के पार्षद एवं सभापति संजय चौधरी का इस्तीफा मंजूर होने के बाद वार्ड क्रमांक-9 के पार्षद अनिल पटेल को नया सभापति बनाए जाने से जहां भाजपा की अंदरूनी राजनीति चर्चा में है, वहीं पीआईसी में कांग्रेस पार्षदों की महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर कांग्रेस जिला नेतृत्व की जवाबदेही पर भी सवाल उठने लगे हैं।
नगरपालिका अध्यक्ष पद भाजपा के पास है। परिषद में भाजपा के निर्वाचित पार्षद भी हैं, लेकिन पीआईसी में कांग्रेस पार्षदों की मौजूदगी और प्रभाव को लेकर लगातार राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कांग्रेस विपक्ष में है तो उसके पार्षद सत्तारूढ़ व्यवस्था की महत्वपूर्ण समितियों में प्रभावशाली भूमिका में कैसे बने हुए हैं?
*संजय चौधरी के आरोपों के बाद भी कार्रवाई क्यों?*
पीआईसी को लेकर पूर्व में भाजपा पार्षदों अनिल पटेल, प्रवीण सिंह और गणेश रौतेल के इस्तीफे तथा परिषद में अनदेखी के आरोपों के बाद राजनीतिक विवाद सामने आया था। इसके बाद पीआईसी में कांग्रेस पार्षदों को स्थान दिए जाने की चर्चा ने भी कई सवाल खड़े किए।
अब संजय चौधरी के इस्तीफे के बाद मामला फिर सुर्खियों में है। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि यदि कांग्रेस पार्षद सत्ता पक्ष की पीआईसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और इसको लेकर सार्वजनिक रूप से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हो रहे हैं, तो कांग्रेस जिला संगठन ने अब तक अपने स्तर पर कोई स्पष्ट कार्रवाई अथवा जवाबदेही तय क्यों नहीं की?
*‘फूल छाप कांग्रेसी’ पर कार्रवाई के निर्देश, फिर अनूपपुर में चुप्पी क्यों?*
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू कांग्रेस के राष्ट्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व के उस कथित रुख से जुड़ता है, जिसमें पार्टी के भीतर भाजपा समर्थक अथवा भाजपा की विचारधारा के साथ खड़े दिखाई देने वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं को लेकर सख्ती की बात कही जाती रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा समय-समय पर संगठन में ऐसे लोगों को बर्दाश्त नहीं करने और आवश्यकता पड़ने पर संगठन से बाहर का रास्ता दिखाने की बात कही जाती रही है।
ऐसे में अनूपपुर नगरपालिका की पीआईसी में कांग्रेस पार्षदों की भूमिका को लेकर स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों ने कांग्रेस जिला संगठन के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी है। यदि पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट निर्देश है कि ‘फूल छाप कांग्रेसी’ स्वीकार्य नहीं हैं और पार्टी लाइन से अलग जाकर सत्ता पक्ष के साथ राजनीतिक भागीदारी करने वालों पर संगठनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, तो फिर अनूपपुर नगरपालिका के मामले में अब तक जिला कांग्रेस की ओर से क्या कदम उठाया गया,यह सवाल भी सामने आ रहा है।
क्या जिला कांग्रेस अध्यक्ष श्याम कुमार ‘गुड्डू’ चौहान ने संबंधित पार्षदों से इस संबंध में जवाब-तलब किया है? क्या पार्टी ने उन्हें कोई संगठनात्मक निर्देश दिए हैं? यदि दिए हैं तो उनका पालन किस स्तर तक हुआ? और यदि पार्टी इस राजनीतिक समीकरण को स्वीकार नहीं करती, तो कार्रवाई में देरी क्यों?
*गुड्डू चौहान की भूमिका पर उठ रहे सवाल*
पूरे मामले में कांग्रेस जिला अध्यक्ष श्याम कुमार ‘गुड्डू’ चौहान की भूमिका सबसे अधिक चर्चा में है। कांग्रेस संगठन के जिला नेतृत्व से अपेक्षा रहती है कि पार्टी की विचारधारा, संगठनात्मक अनुशासन और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
लेकिन अनूपपुर नगरपालिका की मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस पार्षदों की पीआईसी में भूमिका को लेकर संगठन की ओर से कोई प्रभावी सार्वजनिक कार्रवाई दिखाई नहीं देने से जिला अध्यक्ष की कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए सत्ता पक्ष की समितियों में भूमिका को लेकर कोई नीति या निर्देश तय किए हैं, तो उसका पालन सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी स्थानीय संगठन की भी बनती है। ऐसे में सवाल है कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष इस मामले में चुप क्यों हैं?
*राहुल गांधी और जीतू पटवारी के निर्देशों का स्थानीय स्तर पर कितना असर?*
कांग्रेस लगातार संगठनात्मक अनुशासन, भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष और जनहित के मुद्दों को लेकर भाजपा पर सवाल उठाती रही है। राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी और प्रदेश स्तर पर जीतू पटवारी के नेतृत्व में संगठन को मजबूत करने तथा कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर जोर दिया जाता रहा है।
ऐसे में अनूपपुर नगरपालिका का घटनाक्रम स्थानीय कांग्रेस संगठन के लिए भी परीक्षा की घड़ी माना जा रहा है। यदि कांग्रेस के निर्वाचित पार्षद भाजपा अध्यक्ष वाली नगरपालिका की महत्वपूर्ण समिति में भूमिका निभा रहे हैं, तो जिला संगठन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह पार्टी की अधिकृत रणनीति है अथवा पार्षदों का व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय।
*‘मलाई’ छानने की राजनीति या विपक्ष की भूमिका?*
नगरपालिका की राजनीति को लेकर विपक्षी दल के भीतर ही अब यह चर्चा तेज है कि कांग्रेस के निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका आखिर विपक्ष की है या सत्ता व्यवस्था में भागीदारी की?
यदि कांग्रेस पार्षद पीआईसी में शामिल होकर नगरपालिका के निर्णयों में भागीदारी कर रहे हैं, तो कांग्रेस जिला संगठन को जनता के सामने इसकी राजनीतिक और संगठनात्मक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि पार्टी इस व्यवस्था से सहमत नहीं है तो कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही, यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
*भाजपा की खींचतान से कांग्रेस को मिला अवसर?*
नगरपालिका में भाजपा पार्षदों के बीच पूर्व में सामने आए मतभेद और पीआईसी में हुए बदलावों ने कांग्रेस को राजनीतिक स्पेस जरूर दिया है। लेकिन विपक्षी दल के रूप में इस स्पेस का उपयोग जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए होना चाहिए या सत्ता-समीकरण में हिस्सेदारी के लिए, यह फैसला कांग्रेस जिला संगठन को स्पष्ट करना होगा।
*अब गुड्डू चौहान को देना होगा जवाब*
अनूपपुर नगरपालिका की पीआईसी में हुए ताजा बदलाव के बाद राजनीतिक सवाल सीधे कांग्रेस जिला अध्यक्ष श्याम कुमार ‘गुड्डू’ चौहान की ओर मुड़ गए हैं।
क्या कांग्रेस जिला संगठन अपने पार्षदों की पीआईसी में भूमिका से सहमत है?
यदि सहमत है तो इसकी आधिकारिक रणनीति क्या है?
यदि सहमत नहीं है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यदि पार्टी अनुशासन का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?और सबसे महत्वपूर्ण जब कांग्रेस का राष्ट्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व पार्टी के भीतर भाजपा समर्थक गतिविधियों को लेकर सख्त रुख अपनाने की बात करता है, तो अनूपपुर नगरपालिका के मामले में जिला संगठन की ओर से कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही?
फिलहाल अनूपपुर की सियासत में भाजपा के अंदरूनी समीकरणों से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि नगरपालिका में अध्यक्ष भाजपा का है, लेकिन पीआईसी में कांग्रेस की प्रभावी मौजूदगी आखिर किस राजनीतिक समझौते का परिणाम है? संजय चौधरी के आरोपों के बाद कांग्रेस जिला नेतृत्व की चुप्पी ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
अब निगाहें जिला कांग्रेस अध्यक्ष गुड्डू चौहान पर हैं कि वे पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हैं या राजनीतिक चुप्पी को ही अपनी रणनीति बनाए रखते हैं। आखिर कांग्रेस किन विचारधाराओं और किन राजनीतिक सिद्धांतों के साथ जनता के बीच जाएगी,यह सवाल भी अब अनूपपुर की राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।


