श्राद्ध, दान-पुण्य और दीपदान से जुड़ी हैं धार्मिक मान्यताएं
जबलपुर। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के साथ होगा। ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे के अनुसार, आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य करने का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस बार शनिवार को अमावस्या पड़ने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितरों की शांति के लिए अनुष्ठान करने के साथ शनिदेव की पूजा-अर्चना करना भी शुभ माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर उन पितरों का श्राद्ध और तर्पण भी किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या पितृपक्ष के दौरान किसी कारणवश उनका श्राद्ध नहीं हो पाया। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराने, जरूरतमंदों को दान देने तथा कौवे, कुत्ते और गाय को भोजन कराने की परंपरा है। मान्यता है कि इन कार्यों से पितरों को तृप्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पीपल पूजन और दीपदान का महत्व
शनिश्चरी अमावस्या पर पीपल के वृक्ष में जल अर्पित कर दीपक जलाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीपल पूजन से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। वहीं, शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनि मंदिर में सरसों का तेल अर्पित करने के साथ काले तिल, काली उड़द और अन्य सामग्री का दान किया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में इसे शनि की साढ़ेसाती, ढैया और प्रतिकूल दशा से जुड़ी परेशानियों में राहत की कामना के लिए किया जाने वाला उपाय माना गया है।
दक्षिण दिशा में दीपक जलाकर पितरों को दें विदाई
सर्वपितृ अमावस्या की शाम दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा मानते हुए दीपदान करने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, मुख्य द्वार के पास सरसों के तेल का चार बत्तियों वाला दीपक जलाकर पितरों का स्मरण किया जाता है। इस दौरान उनसे जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए श्रद्धापूर्वक विदाई दी जाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित सौरभ दुबे के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य और पूजा-अर्चना की जा सकती है। इन धार्मिक परंपराओं का मूल भाव पूर्वजों का स्मरण, जरूरतमंदों की सहायता और परिवार की सुख-शांति की कामना करना है।


