प्रभु ने कहा जगन्नाथ पुरी के राजा के बगीचे में, बड़े सुंदर कटहल के फल लगे हैं पर यह भेजते नहीं है।
.माधव दास जी बोले चोरी करने की क्या जरूरत है राजा साहब हमारे शिष्य हैं हम कल जाकर उनसे कहेंगे और आपके लिए कटहल ले आएंगे। भगवान बोले ऐसे नहीं, चोरी करके पाने का आनंद अलग होता है। प्रभु और माधव दास जी चोरी करने के लिए राजा के बगीचे में चल दिए प्रभु ने माधव दास जी से कहा धीरे-धीरे बोलना। माधव दास जी को चोरी का कोई अभ्यास नहीं था, जैसे ही दोनों एक कटहल के बगीचे के पास पहुंचे। प्रभु ने माधव दास जी से कहा कटहल के पेड़ के ऊपर चढ़ जाओ। तुम ऊपर से कटहल गिराना, नीचे हम ले लेंगे। माधव दास जी पेड़ के ऊपर चढ़ गए। माधव दास जी ने जोर से पूछा प्रभु यह वाला की यह वाला। आवाज सुनकर बगीचे का माली जाग गया और डंडा लेकर आया इतने में भगवान अंतर ध्यान हो गए।
माधव दास जी पेड़ से उतरने लगे माली ने उन्हें पकड़ लिया और अंधेरे में दो डंडे लगा दिए और रात भर बांध कर रखा। और कहा सुबह राजा जी के पास ले चलेंगे। अब माधव दास जी इधर-उधर देखने लगे.. माली ने पूछा.. क्या देख रहे हो..माधव दास जी ने कहा कुछ नहीं। मन ही मन माधव दास जी ने सोचा कि वह कहां है जो हमें इधर ले आए थे।
सवेरा हुआ। माली माधव दास जी को राजा जी के पास ले जाने लगे। रास्ते में ही राजा जी मिल गए, राजा जी ने देखा कि हमारे गुरु को माली क्यों बांधे ले जा रहा है। राजाजी क्रोध में माली को मारने पहुंचे। माधव दास जी ने कहा इससे कुछ मत बोलो हम जब ऐसे बधने के काम करेंगे तो बंधेगे ही। राजा जी बोले आपने ऐसा क्या काम किया है? माधव दास जी बोले चोरी।
राजा जी माधव दास जी को अपने महल ले गए माधव दास जी ने सारा वृत्तांत राजा साहब को बताया।
सारी बात जानकर राजा साहब जी के नयन सजल हो गए हृदय रोमांचित तो उठा एवं तुरंत ही राजा साहब ने पूरा का पूरा बगीचा श्री जगन्नाथ जी के नाम कर दिया। शाम को पुनः संत माधव दास जी सागर किनारे पहुंचे। वहां भगवान प्रकट हुए भगवान ने माधव दास जी से पूछा और संत जी रात कैसी कटी। संत माधवदास जी बोले हम तो पीटे, रातभर बांधे रहे और आप तो अंतर्ध्यान हो गए लेकिन एक भी कटहल नही ला पाए। हमे देखिए हम तो पूरा का पूरा बगीचा ही आपके नाम करा लाए है।
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कहते हैं आज भी वह बगीचा श्री जगन्नाथ जी के नाम पर है..


