नई दिल्ली, 27 अक्टूबर । सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की बेतहाशा कीमतों को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान साफ कहा कि क्या कंपनियां केवल बिजनेस चला रही हैं या जनहित और उपयोगिता पर भी विचार करेंगी। मुनाफा अलग बात है, लेकिन असंगत मुनाफाखोरी स्वीकार्य नहीं है। याचिकाकर्ता डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने बताया कि उन्होंने कोर्ट में मरीजों के असली बिल लगाकर दिखाए हैं, जिनमें 10 से 15 गुना अधिक राशि वसूली गई है।
संजय कुलश्रेष्ठ ने कहा, “कोर्ट ने बहुत साफ शब्दों में कहा कि क्या आप केवल बिजनेस चला रहे हैं, या फिर जनहित और उपयोगिता के पहलुओं पर भी विचार करेंगे। मुनाफा कमाना अलग बात है, लेकिन असंगत मुनाफाखोरी और अत्यधिक मूल्य वसूली स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट के मन में यह बात पहले से थी। हमारी याचिका पर भी कोर्ट ने इस संबंध में टिप्पणी की थी। हमने अपनी याचिका में मरीजों के वास्तविक बिल भी लगाए थे। जब उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता, जिनमें कपिल सिब्बल भी शामिल थे, बहस करने आए, तो कोर्ट ने कहा कि डॉ. राठौर और कुलश्रेष्ठ की याचिका में अधिकांश बातें स्पष्ट हैं।”
उन्होंने कहा कि हम डॉक्टर हैं और ऑपरेशन करते हैं, इसलिए हमारे मरीजों के बिलों में हमने यह दिखाया था कि कई दवाओं पर 10 से 15 गुना तक कीमत वसूली जा रही है। कोर्ट ने इन तथ्यों को बहस के दौरान स्वीकार किया। हमने अपना लिखित प्रतिवेदन भी दिया था और रिजॉइंडर भी दाखिल किया था। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की ओर से जो तर्क रखे गए थे, उनके जवाब में भी हमने अपने तर्क प्रस्तुत किए।
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने कहा कि हमारा कहना था कि केवल कैंसर की दवाओं को ही शामिल क्यों किया जाए। सभी दवाओं को शामिल किया जाना चाहिए। भारत में सबसे अधिक बिकने वाली दवाएं हृदय रोग, डायबिटीज, एसिडिटी, दर्द निवारक और एंटीबायोटिक हैं। अधिकांश दवाएं कैंसर से संबंधित नहीं हैं। इसलिए सभी दवाओं को दायरे में लाया जाना चाहिए। हमने यह भी कहा कि आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अलग-अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए। किसी मरीज के लिए जो दवा डॉक्टर लिखता है, वह उसके लिए महत्वपूर्ण होती है। जो दवा किसी की जान बचाती है, वह महत्वपूर्ण है, चाहे उसे एसेंशियल माना जाए या नॉन-एसेंशियल।
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने कहा कि यह जो जरूरी और गैर-जरूरी का वर्गीकरण है, इसे मूल रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विशेष परिस्थितियों, आपात स्थितियों और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के संदर्भ में विकसित किया था। लेकिन व्यवहार में हर दवा किसी न किसी मरीज के लिए आवश्यक होती है। दूसरा मुद्दा यह था कि सरकार ने कहा कि वह केवल महंगी दवाओं को लेकर चिंतित है। हमने कहा कि यह कौन तय करेगा कि कौन-सी दवा महंगी है और कौन-सी सस्ती?
उन्होंने कहा कि अगर कोई दवा सस्ती है, तो वह मरीजों के हित में है। उसे सस्ती रहने दीजिए। हर व्यापारी और हर केमिस्ट अपना लाभ प्रतिशत के आधार पर तय करता है। इसलिए केवल कीमत के आधार पर भेदभाव उचित नहीं है। प्रत्येक दवा विक्रेता सस्ती और महंगी दोनों प्रकार की दवाएं बेचता है। उसका कुल लाभ समग्र रूप से निकलता है। इसलिए दवाओं की कीमतों पर अधिक तार्किक और समान नियंत्रण होना चाहिए। जरूरी और गैर-जरूरी के मुद्दे पर भी हमने कहा कि यह वर्गीकरण काफी हद तक मनमाना है।
डॉ. कुलश्रेष्ठ ने कहा कि कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए। पहला, एमआरपी की व्यवस्था को निर्माण स्तर पर लागू करने पर विचार किया जाए। दूसरा सुझाव यह था कि एक ऐसी वेबसाइट या मोबाइल ऐप होनी चाहिए, जहां यह स्पष्ट दिख सके कि किसी दवा पर निर्माता, वितरक, स्टॉकिस्ट और रिटेलर स्तर पर कितना मार्जिन रखा गया है। यह भी स्पष्ट हो कि दवा जरूरी है या गैर-जरूरी, पेटेंटेड है या जेनेरिक। कोर्ट ने हमारी बात सुनी और उस पर विचार किया। हमें उम्मीद है कि कोर्ट ने इस मुद्दे को केवल व्यापारिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवा और जनहित के दृष्टिकोण से भी देखा है। हमने यह भी कहा कि यदि स्वास्थ्य क्षेत्र में लाभ की संभावना नहीं होती, तो इतनी बड़ी संख्या में कंपनियां और निवेशक इसमें नहीं आते।
उन्होंने बताया कि जापान, कोरिया और अन्य देशों की कंपनियां भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश कर रही हैं। अस्पतालों के अधिग्रहण हो रहे हैं। स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में पर्याप्त लाभ की संभावना देखी जा रही है। जहां तक जेनेरिक दवाओं का प्रश्न है, हम उनके विरोधी नहीं हैं। डॉक्टर होने के नाते हम जेनेरिक दवाओं का समर्थन करते हैं, लेकिन कुछ कमियों को दूर करना आवश्यक है। पहली कमी यह है कि यदि बहुत अधिक कंपनियों को एक ही जेनेरिक दवा बनाने की अनुमति दे दी जाए, तो कई बार बिक्री बढ़ाने के लिए अनैतिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। ऐसे में जिस उत्पाद पर अधिक लाभ मिलता है, उसे अधिक बढ़ावा दिया जाता है।
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