उमरिया -केन्द्र की भाजपा सरकार की एथेनाॅल नीति पर जिला कांग्रेस महामंत्री व प्रवक्ता मो0 नईम ने हमला बोलते हुए कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा देश भर के पेट्रोल पंपों पर 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20 Fuel) को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने के बाद से देश का एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग गहरे असमंजस और आक्रोश में है। देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण इलाकों में इस नीति का जमीनी विरोध अब खुलकर सामने आने लगा है। पर्यावरण संरक्षण और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करके विदेशी मुद्रा बचाने का सरकारी तर्क नीतिगत स्तर पर सुनने में जितना आकर्षक और राष्ट्रहित में लगता है, धरातल पर इसका व्यावहारिक और आर्थिक सच उतना ही कड़वा और चिंताजनक है। भाजपा सरकार के इस महत्वाकांक्षी प्रयोग की पूरी कीमत देश के मध्यम वर्ग और साधारण वाहन मालिकों को अपनी जेब और अपने वाहनों की बर्बादी से चुकानी पड़ रही है
सड़क पर दौड़ रहे करोड़ों वाहनों/ गाड़ियों के इंजन इस रासायनिक बदलाव को झेलने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है इसके परिणामस्वरूप वाहनों की लोहे की ईंधन टंकियों में अंदर ही अंदर जंग लग रही है और ईंधन प्रणाली में प्रयुक्त रबर की नलिकाएं (Fuel Lines), ओ-रिंग और प्लास्टिक के गैस्केट गल कर कड़े हो रहे हैं। इससे न केवल महंगे इलेक्ट्रॉनिक फ्यूल पंप और इंजेक्टर्स समय से पहले चोक होकर दम तोड़ रहे हैं, बल्कि वाहनों में ईंधन रिसाव और अचानक आग लगने का गंभीर सुरक्षा जोखिम भी पैदा हो गया है। मैकेनिकल गैरजों में ऐसी गाड़ियों की बढ़ती कतारें भाजपा सरकार की इस नीतिगत जल्दबाजी की प्रत्यक्ष गवाह हैं
कांग्रेस प्रवक्ता मो0 नईम ने कहा- तकनीकी नुकसान से अलग, आर्थिक मोर्चे पर भी यह आम जनता के साथ एक बड़ा धोखा साबित हो रहा है। शुद्ध पेट्रोल (गैसोलीन) की तुलना में एथेनॉल की ऊर्जा सघनता (Energy Density) काफी कम होती है। इसका सीधा और अकाट्य गणितीय असर यह है कि E20 ईंधन से चलने वाले वाहनों के माइलेज में 5% से 8% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। उपभोक्ता पेट्रोल की पूरी और आसमान छूती कीमत चुका रहा है, लेकिन उसे माइलेज कम मिल रहा है। यानी, दाम पूरे पेट्रोल के और माइलेज कम—यह उपभोक्ताओं पर भाजपा सरकार द्वारा डाला गया एक परोक्ष वित्तीय बोझ नहीं तो और क्या है? देश की जनता, जो पहले से ही महंगाई से जूझ रही है, अब गाड़ी के घटते माइलेज और बढ़ते मेंटेनेंस खर्च की दोहरी मार झेलने को मजबूर है।
इस पूरे खेल का सबसे क्रूर और विचलित करने वाला पहलू इसका असमान सामाजिक और आर्थिक ढांचा है। एक तरफ देश के टू-व्हीलर और कार मालिक अपने इंजनों की मरम्मत और घटते माइलेज से त्रस्त हैं, तो दूसरी तरफ गन्ना और मक्का से एथेनॉल बनाने वाले चुनिंदा बड़े कॉर्पोरेट घराने, चीनी मिल मालिक और निजी डिस्टिलरीज बंपर मुनाफा कूट रहे हैं। भाजपा सरकार ने इन औद्योगिक घरानों के लिए एक सुनिश्चित बाजार और ऊंचे दामों की गारंटी तय कर दी है, जिसका पूरा वित्तीय बोझ आम जनता की गाढ़ी कमाई को निचोड़कर उठाया जा रहा है। इसके अलावा, एथेनॉल के लिए अत्यधिक जल-खपत वाली फसलों को बढ़ावा देने से भविष्य में भूजल स्तर गिरने का पर्यावरणीय संकट भी अपनी जगह खड़ा है, जो कृषि क्षेत्रों के लिए आने वाले समय में पानी का बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।
कांग्रेस प्रवक्ता मो0 नईम ने कहा- कि सच्चाई यह है कि जनता में व्याप्त इस आक्रोश को केवल ‘हरित ईंधन’ का नारा देकर दबाया नहीं जा सकता। यदि भाजपा सरकार की नीतियां जनहित के प्रति जवाबदेह हैं, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना होगा। अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरह भारत के भी हर पेट्रोल पंप पर उपभोक्ताओं को 100% शुद्ध पेट्रोल’ (Zero-Ethanol Pure Petrol) का अलग विकल्प अनिवार्य रूप से मिलना चाहिए, ताकि गाड़ियों के मालिक अपने विवेक से अपने वाहन की सुरक्षा तय कर सकें। साथ ही, कम माइलेज देने वाले एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की कीमतों में तर्कसंगत कटौती की जानी चाहिए। बिना वैकल्पिक व्यवस्था के किसी असुरक्षित नीति को जबरन थोपना लोकतंत्र में उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन है, और भाजपा सरकार को इस नीतिगत विफलतापर अविलंब संज्ञान लेना ही होगा।


